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Saturday, September 12, 2026

श्री गणेश संकट नाशन स्तोत्र: हिंदी अर्थ, पाठ करने की विधि और इसके अद्भुत लाभ

ओम गणेशाय नमः नमस्कार दोस्तों किसी भी पूजा की शुरुआत करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है । सनातन धर्म के मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा तभी सफल होता है जब पूजा के शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा और आराधना की जाए। जिस पूजा में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा नहीं की जाती है , सफल नहीं मानी जाती और उसका पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता इस लेख में आज हम आपको यही बताएंगे कि भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले क्यों की जाती है और इसके पीछे की कहानी क्या है  ।



तथा इसका पौराणिक महत्व क्या है हम सब लोग जानते हैं कि भगवान गणेश भगवान शिव यानी कि भोलेनाथ के पुत्र हैं भोलेनाथ अपने पुत्रों से बहुत ही प्यार कर भोलेनाथ के दो पुत्र प्रथम भगवान गणेश द्वितीय भगवान कार्तिके एक बार भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय मि इस बात को लेकर बहस छिड़ गया कि मैं विश्व में सबसे बड़ा हूं दोनों लोगों में यह बहस काफी देर तक चला अपने को कोई छोटा मानने को तैयार नहीं था जब यह बात भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचा तो भगवान शिव ने कहा कि ठीक है हम तुम दोनों का परीक्षा लेंगे और जो इस परीक्षा में सफल हो जाएगा वही सबसे बड़ा माना जाएगा और किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले उनकी पूजा की जाएगी उनकी इस बात को सुनकर भगवान गणेश और भगवान कार्तिके दोनों ही बहुत प्रसन्न और इस परीक्षा को देने के लिए तैयार है तब भगवान शिव ने कहा की तुम दोनों लोगों में से जो पूरे विश्व का भ्रमण करके सबसे पहले मेरे पास आएगा वही सबसे श्रेष्ठ माना जाएगा। भगवान गणेश की जो सवारी है वह चूहा है ,और चूहा कितना तेज दौड़ता है, यह तो सब लोग जानते हैं । भगवान गणेश को इस बात की बहुत बड़ी चिंता हुई  कि मेरा तो सवारी बहुत धीरे-धीरे चलता है , मैं पूरे विश्व का चक्कर लगाकर सबसे पहले कैसे आ सकता है, लेकिन भगवान शिव आदेश देने के बाद दोनों अर्थात भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश विश्व विश्व भ्रमण के लिए तैयार हो गए ल
भगवान कार्तिक विश्वकर्मा के लिए सबसे पहले लेकिन भगवान गणेश अभी अपने ही स्थान पर खड़े विचार कर रहे थे कि आप किस तरह से पहले आ जाए बहुत विचार करने के बाद उनके दिमाग में विचार आया कि नहीं हम अपने माता-पिता अर्थात भगवान शिव और माता पार्वती के चारों तरफ के चक्कर लगाऊं और यह विचार मन में आते ही उन्होंने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माता पार्वती के चारों तरफ चक्कर लगाकर उनके सामने आकर खड़े कर भगवान शिव को बड़ा आश्चर्य हुआ। और उन्होंने भगवान गणेश से पूछा कि पुत्र यह तुम क्या कर रहे हो मैं तो तुम्हें विश्व भावना के लिए भेजा था लेकिन तुम तो हम दोनों के चारों तरफ चक्कर लगाकर सामने आकर खड़े हो गए । इस पर भगवान गणेश ने कहा कि पिताजी विश्व में सबसे बड़ा आप ही है । आप महादेव आनंद और अविनाशी आपसे आपसे बाद इस पूरे जगत में कोई नहीं है अतः मैं अपने माता-पिता का चक्कर लगा लिया तो मेरे लिए विश्व भ्रमण के बराबर पुण्य प्राप्त हो गया । इस बात को सुनकर भगवान शिव बहुत ही प्रसन्न। जब भगवान कार्तिकेय विश्व भ्रमण करके आए तो उन्होंने देखा कि गणेश तो पहले ही भगवान शिव के सामने उपस्थित है यह देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि गणेश से सबसे पहले कैसे आए फिर जब उन्हें सारी घटना पता चला तो कुछ नहीं कर पाए और इसके बाद भगवान शिव अपना निर्णय सुनाया कि आज के बाद किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा की जाएगी 


संकट नाशन गणेश स्तोत्र (मूल पाठ एवं हिंदी अर्थ)
नारद पुराण के अनुसार 'संकट नाशन गणेश स्तोत्र' (Sankat Nashan Ganesh Stotra) एक ऐसा दिव्या और चमत्कारी स्रोत है , जिसके जिसे रोज नियम से तथा ध्यान लगाकर जाप करने से बड़ा ही उत्तम और फलदायक होता है जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित रूप से जब करता है भगवान उसे पर भगवान गणेश की कृपा हमेशा बनी रहती है उसके सारे मनोकामना पूर्ण हो जाती है अर्थात जीवन के बड़े से बड़े संकट, वित्तीय परेशानियां और मानसिक तनाव दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं इस स्तोत्र का मूल पाठ, उसका हिंदी अर्थ और पाठ करने की सही विधि नीचे दिया गया है
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥
अर्थ: गौरी पुत्र विघ्न विनायक भगवान गणेश को सिर झुकाकर प्रणाम करें। अपनी आयु, कामनाओं और धन की सिद्धि तथा प्राप्ति के लिए भक्तों के हृदय में निवास करने वाले भगवान गणेश का रोज स्मरण ध्यान करना चाहिए।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥
अर्थ: पहला नाम 'वक्रतुंड' (टेढ़ी सूंड वाले)और दूसरा नाम 'एकदंत' (एक दांत वाले), तीसरा नाम 'कृष्णपिंगाक्ष' (काली और भूरी आंखों वाले) अर्थात जिसका रंग सांवला हो या श्याम वर्ण वाला हो तथा जो धुएं के रंग अर्थात धूम्र वर्ण जैसा हो और चौथा नाम 'गजवक्त्र' अर्थात जिसका मुंह हाथी के चेहरे जैसा हो या  या हाथी के मुख वाला
 मुद्गलपुराण के अनुसार, 'गज' शब्द में 'ग' का अर्थ  सिद्धांत होता है जिसमें सब कुछ विलीन अर्थात निहित इसमें सब कुछ समा जाता है होता है और 'ज' का अर्थ जिससे सब कुछ उत्पन्न होता हो तथा जिसे सब कुछ बनता हो अथवा अर्थात सृजन होता  होता है। इस प्रकार 'गजवक्त्र' का शुद्ध और आध्यात्मिक अर्थ संपूर्ण सृष्टि के प्रलय और सृजन लिया जाता है
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकट च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३ ॥
अर्थ: पांचवां नाम 'लम्बोदर' अर्थात लंबा हो उदर जिसका, छठा नाम 'विकट' (विशाल जो सबसे बड़ा हो), सातवां नाम 'विघ्नराजेंद्र' (जो सबके कष्ट को हरण कर लेता है जो सबके दुख को दूर करता है),और आठवां नाम 'धूम्रवर्ण' (धुएं के रंग वाले) है।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥
अर्थ: नौवां नाम 'भालचंद्र' अर्थात जिसके माथे पर हमेशा चंद्रमा विराजमान रहता है दसवां नाम 'विनायक' अर्थात जो सबके कासन का हरण करने वाला हूं जो सबके दुखों को दूर करता हो, ग्यारहवां नाम 'गणपति अर्थात भगवान शिव के गण में सबसे श्रेष्ठ जो भगवान शिव के गण का अधिपति हो यानी नायक हो यानी जो सबसे बड़ा हो जिसकी पूजा सबसे पहले होती हो और बारहवां नाम 'गजानन' है। अर्थात जिनका चेहरा हाथी के समान हो
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥ ५ ॥
अर्थ: जो मनुष्य दिन के तीनों प्रहार अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में, मध्यान में और शायं कल में  इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे उसे किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होता है उसके सारे मनोकामना पूर्ण हो जाते हैं और उसे सभी सिद्धियों भी प्राप्त सहज ही हो जाए और उसे पर भगवान गणेश की कृपा हमेशा बनी रहती है तथा उसके जीवन में कोई भी संकट ,रोग या बाधा नहीं आता है
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६ ॥
अर्थ: इस  पाठ को करने से मनुष्य की हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है अर्थात जिन बालकों को विद्या की चाह होती है विद्या सहज ही मिल जाता है , जिन मनुष्य को धन की इच्छा होती है उनको धन ही उनकी इच्छा अनुसार मिल जाती है तथा जिनको पुत्र पुत्रियाँ या अपने सुख की चिंता होती है  होती है उन्हें भगवान गणेश की कृपा से सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है, जिन्हें मोच की इच्छा रहती है उनका मोक्ष की प्राप्त होता है जिन्हें सिद्धियों की इच्छा होती है उने सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
अर्थ: इस गणपति स्तोत्र का जाप करने से छह महीना के अंदर संपूर्ण फल की प्राप्ति होती है तथा अगर इस स्तोत्र का पाठ 1 साल तक निरंतर नियम से किया जाए तो संपूर्ण सिद्धियां प्राप्त हो जाती है इसमें कोई संदेश नहीं है।
अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥
अर्थ:  इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों को समर्पित करता है, भगवान श्री गणेश की कृपा हमेश बनी रहती है और उसे समस्त विद्याओं और ज्ञान की प्राप्ति सहज ही होती है।
॥ इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

पाठ करने की सही विधि

इस पाठ का संपूर्ण लाभ उठाने के लिए पंचांग से या किसी विद्वान ब्राह्मण से शुभ मुहूर्त पूछ कर और मन में यह संकल्प लेकर किए भगवान मैं आपका पूजा करने जा रहा हूं आप हमारे सारे कष्ट को दूर करेगा 
समय: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य क्रिया करने के बाद गंगा में स्नान करें और यदि गंगा नदी पास ना हो तो किसी भी शुद्ध जल से स्नान करके आसान बेचकर पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके बैठना जाए यदि आपको संस्कृत का मंत्र याद है तो आप मंत्र के साथ अपनी को शुद्धिकरण करे और यदि नहीं याद है तो आप अपने ऊपर जल छिड़कते हुवे भगवान गणेश का प्रार्थना करे कि हे भगवान में श्रद्धा भाव से आपका पूजा करने जा रहा हूं आप हमारी सारी मनोकामना को पूरा करेगा
सामग्री: भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं।
आवश्यक सामग्री 
फूल 
माला 
अष्टगंध 
दूर्वा 
चावल 
कपूर
अगरवत्ती 
धूप
फल 
लड्डू
शमी पत्र
संकल्प लेने के बाद भगवान गणेश से प्रार्थना करेंगे भगवान मैं आपका पूजा करने जा रहा हूं जो भी गलती होगा अपने पथ की शुरुआत कर पूजा करने के बाद भगवान गणेश से श्रद्धा भाव से क्षमा याचना अवश्य करेगा ताकि हमें पूजा करने में जो कमी आया हो जो कि यहां जो टूटी हुई है इसके लिए क्षमा करिए और अंत में भगवान गणेश का आरती अवश्य करिए
पाठ करने से लाभ 
बाधाओं से मुक्ति: व्यापार, नौकरी या शिक्षा में आ रही बाधा तथा बिगड़ा हुआ काम शीघ्र ही पूर्ण हो जाता है
मानसिक शांति: मां को शांति मिलती है तथा राहु और केतु का दुष्प्रभाव भी दूर हो जाता है
एकाग्रता में वृद्धि: यदि विद्यार्थी इस पाठ को नित्य प्रतिदिन पढ़ते हैं तो उनकी बुद्धि तीव्र होती है उनका एकाग्रता बढ़ता है तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है


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